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Let’s take a look.
2 x 9 = 18 1 + 8 = 9
3 x 9 = 27 2 + 7 = 9
4 x 9 = 36 3 + 6 = 9
5 x 9 = 45 4 + 5 = 9
6 x 9 = 54 5 + 4 = 9
7 x 9 = 63 6 + 3 = 9
8 x 9 = 72 7 + 2 = 9
9 x 9 = 81 8 + 1 = 9
Multiply by 5: It’s All 5s and 0s
2 x 5 = 10 3 x 5 = 15
4 x 5 = 20 5 x 5 = 25
6 x 5 = 30 7 x 5 = 35
2 x 5 = 10 2 / 2 = 1
4 x 5 = 20 4 / 2 = 2
6 x 5 = 30 6 / 2 = 3
3 x 5 = 15 3 – 1 = 2 2 / 2 = 1
5 x 5 = 25 5 – 1 = 4 4 / 2 = 2
7 x 5 = 35 7 – 1 = 6 6 / 2 = 3
Multiply by 3: It All Adds Up
8 x 9 = 72 7 + 2 = 9
4 x 3 = 12 1 + 2 = 3
5 x 3 = 15 1 + 5 = 6
6 x 3 = 18 1 + 8 = 9
7 x 3 = 21 2 + 1 = 3
।।माँ का जयकारा।।
प्रेम से बोलो जय माताकी
सारे बोलो जय माताकी
ओ आते बोलो जय माताकी
जाते बोलो जय माताकी
कष्ट निवारे जय माताकी
माँ पार उतारे जय माताकी
मेरी मैया भोली जय माताकी
भर देती झोली जय माताकी
माँ जोडे दर्पण जय माताकी
माँ दे दे दर्शन जय माताकी
माँ शेरावाली जय माताकी
माँ सिँह सवारी जय माताकी
माँ लगती प्यारी जय माताकी
माँ रबसे न्यारी जय माताकी
आ गर्इ माता जय माताकी
करलो दर्शन जय माताकी
खुले दर्शन जय माताकी
सर को झुकालो जय माताकी
प्रेम से बोलो जय माताकी
।। पुजा के बारह फूल।।
डर हुए को अभय दान दो भुखे को अनाज का दान।
प्यासे को जलदान करो, अपमानित का आदर सम्मान।।
विद्यादान करो अनपढ को, विपद ग्रस्त को आश्रय दान।
वस्त्रहीन को वस्त्रदान दो, रोगी को औषध का दान।।
धर्म रहित को धर्म सिखाओ, शोका तुर कोधीरज दान।
भूले को सन्मार्ग बतादो, गृह विहिन को दो गृहदान।।
करो सभी निस्वार्थ भावसे, मन मे कभी ना हो अभिमान।
अपने सम सबही को माना, फिर किस पर किसका अहसान।।
यन बारह पुण्योँ से, प्रभु का करता जो अर्चन ओ ध्यान।।
हो निश्काम प्रेम युत, उसको मिलते है भगवान।।
श्री देवीजी की आरती
जग जननी जय। जय।। (माँ)। जग जननी जय। जय।। (माँ)।।,
भयहारिणी, भवतारिणी, भव भामिनी जय। जय।। जय।।।
तू ही सत् चित् सुखमय शुद्ध ब्रह्यरूपा।
सत्य सनातन सुन्दर पर शिव सूर भूपा।।१।।
जग जननी।
आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी।
अमल अनन्त अगोचर, अज आनँद राशी।।२।।
जग जननी।
अविकारी, अधहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि हर सँहारकारी।।३।।
जग जननी।
तू विधि वधू, रमा, तू उमा, महामाया।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया।।४।।
जग जननी।
राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रज रानी राधा।
तू वाच्छाकल्पय्रुम, हारिणि सब बाधा।।५।।
जग जननी।
दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकटा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धारा।।६।।
जग जननी।
तु परधाम निवासिनि, भहाबलासिनि तू।
तु ही श्मशान विहारिणी, ताण्डवलासिनि तू।।७।।
जग जननी।
सुर मुनि मोहिनी सौभ्या तू शोभा धारा।
विवसन विकट सरूपा, प्रलयमयी धारा।।८।।
जग जननी।
तू ही स्नेह सुधामयि, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही आस्थि तना।।९।।
जग जननी।
मूलाधार निवासिनि, इह पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू दरदे।।१०।।
जग जननी।
शक्ति शालिधर तू ही नित्य अभेदमयी।
भेदप्रदर्शिनी वाणी विभले । वेदत्रयी।।११।।
जग जननी।
हम अति दीन दुखी मा। विपत जाल घेरे।
हैँ कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे।।१२।।
जग जननी।
निज स्वभाववश जननी। दया दृष्टि की जै।
करूण कर करूणामयि। चरण शरण दी जै।।१३।।
जग जननी।
श्रीमहालक्ष्मै नमः
लक्ष्मि चालिसा
दोहा
सोरठा
सिन्धु सुता मै सुमिरो तोहि।
ज्ञान बुदि विद्या दो मोहि।।
तुम समान नहि कोउ उपकारि।
सब विधि पुरवहु आस हमारि।।
जै जै जगत जननि जगदम्बा।
सब कै तुमहि हो अवलम्बा।।
तुम हो सब घट घट कि वासि।
विनति यहि हमारि खासि।।
जग जननि जय सिन्धु कुमारि।
दिनन कि हो तुम हितकारि।।
विनवो नित्य तमहि महरानि।
कृपा करो जग जननि भवानि।।
केहि विधि अस्तुति करो तिहारि।
सुधि लिजै अपराध बिसारि।।
कृपा दृष्टि चितवो मम औरि।
जगत जननि विनति सुन मोरि।।
ज्ञान बुद्धि जय सुख कि दाता।
सकट हर्औ हमारि माता।।
क्षिर सिन्धु जब विष्णु मथायो।
च्औदह रत्न मे तुम सुखरासि।
सेवा कियो पभुहि बनि दासि।।
जो जो जन्म जहा पभु लिन्हा ।
रूप बदल जह सेवा किन्हा।।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लिन्हेउ अवधपुरि अवतारा।।
तब तुम पकट जनकपुर माहि।
सेवा कियो हृदय पुलकाहि।।
अपनायो तोहि अन्तयामि।
विश्व विदित त्रिभुवन के स्वामि।।
तुम सम पबल शति नहि आनि।
कह तक महिमा कह्औ बखानि।।
मन क्रम वचन करै सेवकाइ।
मन इच्छित वांछित फल पाइ।।
तजि छल कपट और चतुराइ।
पुजहि विविध भाति मन लाइ।।
और हाल मै कह्औ बुझाइ।
जो यह पाठ करै मन लाइ।।
ताको कोइ कष्ट न होइ।
मन इच्छित पावत फल सोइ।।
त्राहि त्राहि जै दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणि।।
जो यह पढै और पढवावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै।।
ताको कोइ न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पति पावै।।
पुत्र हिन अरू सम्पति हिना।
अन्ध बधिर कोढि अति दिना।।
विप बोलाय के पाठ करावै।
शंका दिल मे कहि न लावै।।
पाठ करावै दिन चालिसा।
तापर कृपा करै ग्औरिशा।।
सुख सम्मति बहुत सो पावै।
कमि नहि काहु कि आवै।।
बारह मास करै जो पुजा।
तेहि सम धन्य आन नहि दुजा।।
पति दिन पाठ करै मन माहि।
उन सम कोइ जग मे कहु नाहि।।
बहु विधि क्या मै कर्औ बडाइ।
लेय परिक्षा ध्यान लगाइ।।
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्धि उपजै उर पेमा।।
जय जय जय लक्ष्मी महरानी।
सब मे व्यापित हो गुणखानी।।
तुम्हरो तेज पबल जग माहि।
तुम सम कोउ दयालु कहुँ नाहिं।।
मोहि अनाथ कि सुधि अब लिजै।
सकट काट भति मोहि दिजै।।
भुल चुक करि क्षमा हमारि।
दशन दिजै दशा निहारि।।
बिन दशन व्याकुल अधिकारि।
तुमहिं अछत दुख सहते भारि।।
नहिं मोहि ज्ञान बुद्धि है तन में।
रूप चतुभुज करके धारणा।
कष्ट मोर अब करो निवारण।।
केहि पकार मै कर्औ बडाइ।
ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाइ।।
उठिके पात करत असनाना।
जो कछु बनै करै सो दाना।।
अष्टमि को व्रत करै जो पानि।
हरषि हृदय पुजहि महरानी।।
सोलह दिन पुजा विधि करहिं।
आश्विन कृष्ण जो अष्टमि परहीं।।
ताकर सब छुटे दुख दावा।
सो जन सुख सम्पति नित पावा।।
दोहा
त्राहि त्राहि दुख हारिणि, हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करि दुश्मन का नाश।।
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पै, करहु दया की कोर।।
लक्ष्मीजी की आरती
जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमकूँ निशि दिन सेवत, हर विष्णु धाता।।टेक
ब्रहाणी, रूद्राणी, कमला, तू ही है जगमाता। मैया
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता।। जय लक्ष्मी
दुर्गा रूप निरंजनि सुख सम्पति दाता। मैया
जो कोइ तुमकूँ ध्यावत ऋद्धि सिद्धि धन पाता।। जय लक्ष्मी
तूही है पाताल वसन्ती, तूही है शुभदाता। मैया
कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता।। जय लक्ष्मी
जिस घर थारो वासो, वाही में गुण आता। मैया
कर न सकै सोइ कर ले मन नहिं धडकाता।। जय लक्ष्मी
तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न होय राता। मैया
खान पान को वैभा तुम बिन नहिं भाता। जय लक्ष्मी
शुभ गुण सुन्दर युक्ता, क्षीर निधि जाता। मैया
रत्न चतुर्दश कूँ तो कोइ भी नहिं पाता।। जय लक्ष्मी
श्रीलक्ष्मीजी की आरति जो कोइ नरगाता। मैया
उर आनन्द अति उमँगे पाप उतर जाता।। जय लक्ष्मी
स्थिर चर जगत बचावै, कर्म, प्रचुर ल्याता। मैया
राम प्रताप मैया की शुभ दृष्टि पाता।। जय लक्ष्मी
तुमकूँ निशिदिन सेवत हर विष्णु धाता।। जय लक्ष्मी
लक्ष्मी प्रार्थना
महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरिप्रिय नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।
पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे।
सर्वभूतहितार्थाय वसुवष्टिं सदा कुरू।।
नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्यधारिणि।
वसुवृष्टे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम्।।
विष्णप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं जगद्धिते।
आर्तिहन्त्रि नमस्तुभ्यं समृद्धि कुरू मे सदा।।
त्राहि त्राहि महालक्ष्मि त्राहि त्राहि सुरेश्वरि।
त्राहि त्राहि जगन्मातर्दारिद्रयात्त्राहि वेगतः।।
त्वमेव जननी लक्ष्मी पिता लक्ष्मी त्वमेव च।
भ्राता त्वं च सखा लक्ष्मी विद्या लक्ष्मी त्वमेव च।।
दुष्टदलन रघुनाथ कला की।
जाके बल से गिरिवर कापै,
रोग दोष जाके निकट न झांकै।
अंजनिपुत्र महा बलदाइ,
संतन के प्रभु सदा सहाइ।
दे बीरा रघुनाथ पठाये,
लंका जारि सिय सुधि लाये।
लंका सो कोट समुद्र सी खाइ,
जात पवनसुत बार ना लाइ।
लंका जारि असुर संहारे,
सियारामजी के काज संवारे।
लक्ष्मण मूछित पडे सकारे,
अनि संजीवन प्राण उबारे।
बैठी पाताल तोरि जमकारे,
अहिरावन की भुजा उखारे।
बाय भुजा असुर दल मारे,
दाहिने भुजा संतजन तारे।
सुर नर मुनिजन अरती उचारे।
कंचन थार कपूर लै छाइ,
अरती करत अजना माइ।
जो हनुमान जी की अरती गावै,
बसि बैकुठ परमरद पावै।
लंक विध्वस कीन्ह रघुराइ,
तुलसीदास प्रभु कीरति गाइ।